विजयादशमी, बुराई पर अच्छाई की जीत, अनैतिकता पर नैतिकता की विजय, इसी रूप में इस पर्व को देखा जाता है। आज पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण रहा। लोगों ने एक दूसरे को दशहरे की शुभकामनायें दीं, घर के द्वार पर तोरण आदि बांधे। अपने खून-पसीने की कमाई से लाये गए वाहनों का अभिषेक किया व फूलों की मालाएँ चढ़ाकर उनकी पूजा-अर्चना की। घर में तरह-तरह के पकवान बने, जिसका सभी ने अवश्य आनंद उठाया। आज सभी ने पूरे मन से इस त्यौहार को मनाया । बुराई पर अच्छाई की जीत! बड़ा आश्चर्य होता है, इस बारे में सोचकर व आज की परिस्थिति देखकर। यह बात सतयुग के लिए ही शोभनीय है, आज कलियुग में ऐसी आशा करना भी मूर्खता है। मानव में आज मानवता छोड़कर अन्य हर भाव दृश्यमान हो रहे हैं। हर एक व्यक्ति खुद को शक्तिशाली दिखाने की होड़ में लगा हुआ है। गरीब व असहाय, उच्च वर्ग के हर तबके द्वारा सताए जा रहे हैं। धर्म-जाति के नाम पर गृह युद्ध विराम लेने का कोई संकेत नहीं दे रहा। लोग अपने स्वार्थ हेतु किसी भी श्रेणी तक जाने को तैयार हैं। मध्यम वर्ग, जो अपनी सभ्य संस्कृति व ईमानदारी की मिसाल बना हुआ था, आज उसके कदम भी लड़खड़ा रहे हैं।...
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