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अन्न की कीमत पैसों से ना तौलें..!!

अन्न की कीमत पैसों से ना तौलें..!! ------------------------------------- एक बार मैंने दादाजी से पूछा,"आप खेती करते हैं, लेकिन खेती में जो लागत आती है, वह तो पैदावार से अधिक होती है। इससे फायदा क्या? फिर आप क्यों इतनी मेहनत करते हैं, व्यर्थ पसीना बहाते हैं..!! इससे तो अच्छा हो..कि हम अनाज बाजार से ही खरीद कर खायें।" इस पर दादाजी मुस्कुराये, और बोले," बेटा, खेती करने से भले ही मुझे कोई लाभ न हो, पर मैं एक किसान हूँ और मेहनत करना मेरा धर्म है। अपने द्वारा पैदा किया हुआ अनाज खाकर मुझे जो संतुष्टि मिलती है, वह बाजार से खरीदकर लाये गए अनाज को खाकर नहीं होगी; और यदि सभी तुम्हारे जैसा सोचने लगें, तो अन्न पैदा कौन करेगा..? और तुम जिस बाजार से अन्न खरीदने की बात कर रहे हो, वहाँ भी अनाज कहाँ से आएगा..?" दादाजी की इस बात को सुनकर मैं सोच में पड़ गया..!! आज जो किसान अपना खून-पसीना बहाकर धरती के सीने से अन्न पैदा करता है..उसकी दशा कितनी दयनीय है..!!..और..उसी के द्वारा पैदा किये हुए अन्न को बाजार में बेचकर बड़े-बड़े सेठ-साहुकार अपनी झोली भर रहे हैं और विलासितापूर्ण जीवन...

'वह माँ '

'वह माँ ' •••••••••••••••••• अपने छह माह के शिशु को रेल्वे प्लेटफार्म पर सुलाकर वह माँ लोगों की सहानुभूति बटोरती भीख में मिले उन पैसों पर जीती और खाती। भादों की एक सुबह उसी प्लेटफार्म की ठंडक उस छह माह के शिशु को निगल गई और वह माँ बेजान शिशु को कलेजे से लिपटा बिलखकर रह गई..!! 💦 💦 💦 💦 (सत्य घटना पर आधारित- बान्द्रा स्टेशन, प्लेटफार्म क्र.1) - इंद्रकुमार विश्वकर्मा

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती.

"मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती..", यह प्रसिद्ध गीत हमें किसानों के जीवन में उनके कठोर परिश्रम से उपजे खुशियों की याद दिलाता है; लेकिन आज ये खुशियाँ दिन-बदिन उससे कोसों दूर जाती हुई प्रतीत हो रही हैं..!! किसान 'गजेन्द्र सिंह' ने अपने ही गमछे को, जिसे वह कठोर परिश्रम के दौरान पसीना पोछने और धूप से बचने के लिए पगड़ी के रूप में काम में लाता था, उसी गमछे को अपनी मृत्यु का हथियार बना लिया..!! गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या से इस देश की धरती एक बार पुनः शर्मसार हुई है..!! आज धरती माता अपने ही पुत्र की रक्षा कर पाने में असमर्थ है..!! लेकिन इस तथाकथित मानवता को जरा भी शर्म नहीं आएगी..!! किसानों की आत्महत्या का क्रम थमने का नाम नहीं ले रहा..!! इस पर सरकार कोई भी कारगर उपाय कर पाने में पूरी तरह से असमर्थ रही है..!! आज सदन में निश्चय ही इस विषय पर बहसबाजी होगी..!! पक्ष और विपक्ष दोनों में घमासान होगा, लेकिन किसानों के हित में कोई फैसला नहीं होगा..!! गजेन्द्र सिंह का शव कुछ देर पहले ही उनके घर पहुँचा..!! बेटे की मौत की खबर से पिता की हालत खराब हो गई है..!! अभी ...

रक्षाबन्धन : भाई -बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक

रक्षाबन्धन एक हिन्दू त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है।  राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बाँधती हैं परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बन्धियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है। कभी कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है। अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बाँधने की परम्परा भी प्रारम्भ हो गयी है। हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरुष सदस्य परस्पर भाईचारे के लिये एक दूसरे को भगवा रंग की राखी बाँधते हैं। हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष...

ईद - उल - फ़ित्र : मानवता व प्रेम का पर्व

इस्लाम धर्मावलंबी  रमज़ान उल-मुबारक के महीने के बाद एक मज़हबी ख़ुशी का त्यौहार  मनाते हैं जिसे ईद उल-फ़ित्र कहा जाता है। ये यक्म शवाल अलमकरम को मनाया जाता है। ईद उल-फ़ित्र शव्वल -- इस्लामी  कैलंडर के दसवें महीने -- के पहले दिन मनाया जाता है। इस्लामी  कैलंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नए चाँद के दिखने पर शुरू होता है। मुसलमानों का त्योहार ईद मूल रूप से भाईचारे को बढ़ावा देने वाला त्योहार है. इस त्योहार को सभी आपस में मिल के मनाते है और खुदा से सुख-शांति और बरक्कत के लिए दुआएं मांगते हैं।  पूरे विश्व में ईद की खुशी पूरे हर्षोल्लास से मनाई जाती है।  मुसलमानों का त्योहार ईद रमज़ान का चांद डूबने और ईद का चांद नज़र आने पर उसके अगले दिन चांद की पहली तारीख़ को मनाई जाती है।  इसलामी साल में दो ईदों में से यह एक है (दूसरा ईद-उल-जुहा या बकरीद कहलाता है) ।  पहला ईद उल-फ़ितर पैगम्बर मुहम्मद ने सन 624 ईसवी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था।  उपवास की समाप्ति की खुशी के अलावा इस ईद में मुसलमान अल्लाह का शुक्रिया अदा इसलि...

अनभै

कल विद्यालय से छूटकर अमित जी से मिलने नवभारत के कार्यालय पहुँचा।  उनसे मुलाक़ात की। एक लम्बे अरसे के बाद मिले थे।   काफी देर तक बातचीत हुई।  तत्पश्चात हम दोनों घर की तरफ साथ ही निकले। रास्ते में भी काफी बातें हुईं।  पता चला कि उन्होंने ब्लॉग लिखना प्रारंभ कर दिया है।  मैंने  भी पुनः ब्लॉग  लिखने की ठानी। उसी का परिणाम है कि आज इतने दिनों के पश्चात् पुनः लिखने बैठा हूँ।  'अनभै'  के ३३वे अंक में मेरी कविता '  आधी सूखी रोटी ' प्रकाशित हुई। बड़ी प्रसन्नता हुई। गुरुवर  डॉ. रतनकुमार पाण्डेय जी से कविता लिखने के सन्दर्भ में कई अन्य मार्गदर्शन भी मिले। कल विद्यालय में सम्पन्न हुई '  वक्तृत्व स्पर्धा  ' का समाचार दैनिक नवभारत के आज के अंक  में प्रकाशित हुआ है । समाचार पत्र में अपना नाम देखकर किसे ख़ुशी न होगी। मुझे भी अच्छा लगा।  जल्द ही अपनी कुछ अन्य कविताओं को  ब्लॉग पर प्रकाशित करूँगा। 

एक शिक्षक..

शाम के छह बजनेवाले हैं. आज पहली बार नहीं रोज ही बजता है, परन्तु हर पल नया होता है, उसकी तुलना बीते हुए पल से कभी नहीं की जा सकती. अतः हर पल जीवन को नया आयाम प्रदान करता है. मनुष्य की मानसिक स्थिति भी सदैव एक सी नहीं होती. आज मेरा मन भी कल्पना के आलोक में भ्रमण करने को आतुर हो रहा है. यह आतुरता उचित है या नहीं, इस विषय पर मैं अपने विचार प्रकट करना नहीं चाहूँगा. परन्तु मेरे जीवन मैं मेरी भावनाओं के लिए अवश्य स्थान होना चाहिए. एक शिक्षक के रूप में जीवन व्यतीत करना आग की दरिया में नाव पर चलने के समान है. आप कितना भी बचने का प्रयास करें, लेकिन इसकी आंच से बचना लगभग असंभव होता है.                  अपना सम्पूर्ण जीवन विद्यार्थियों के लिए अर्पित कर देने के पश्चात् एक शिक्षक के पास अंत में शायद ही कुछ शेष बचता है. अवकाश के पश्चात बाहरी जीवन से सामंजस्य स्थापित करने में जो कठिनाई आती है, उसे एक शिक्षक के अतिरिक्त शायद ही कोई समझ सके.